मित्रों भगवान श्रीचित्रगुप्त जी का आदेश/अथवा मनोइच्छा है (जहां तक मैं समझ सकता हूं) कि ज्ञान की पूजा की जाए, जो कायस्थ भगवान श्रीचित्रगुप्त का मंदिर बनाना चाहते हैं उनको चाहिये कि वो मंदिर की जगह कायस्थपाठशाला की स्थापना में योगदान दें।ये पाठशाला अत्याधुनिक विद्यालय होने के साथ ही विश्वविद्यालय भी हो। यहां राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सभी पाठ्यक्रम उपलब्ध करवाने का प्रयास किया जाये। इसके साथ ही वो कायस्थ बच्चे और युवा जो पढऩे या खेलकूद में विशेष योग्यता का प्रदर्शन करें उनको सहायता दी जाये ताकि वो उस क्षेत्र में आगे बढ़ सकें। छात्रवृत्तियां और प्रोत्साहन राशि देकर छात्रों और छात्राओं का उत्साहवर्धन किया जाये। कन्याओं को विशेष छूट भी प्रदान की जाये। समय-समय पर विशेषज्ञों के संभाषणों का आयोजन भी किया जाये। मुफ्त में ट्यूशन और विशेष मार्गदर्शन की व्यवस्था की जाये। सारी सुविधाएं विश्वस्तरीय हों।
मित्रों भगवान श्रीचित्रगुप्त ज्ञान के देवता है। पत्थरों को तो सभी समाज पूजते हैं देवचित्रगुप्त को हार्दिक हर्ष तब ही होगा जब ऐसा कुछ रचनात्मक किया जाये जो युगों का सृजन करे।
आप सभी को बता दूं कि ऐसा ही रचनात्मक चिंतन कालीप्रसाद जी कुलभास्कर द्वारा किया गया था जो कायस्थपाठशाला के रूप में सामने आया।
ये एक क्रांति का बीज है अगर बोया जाये और सींचा जाये तो वो महावृक्ष उत्पन्न हो जो कायस्थों को उनका खोया मान पुन: दिलवायेगा। इसके राजनीति न हो तो बहुत ही अच्छा होगा।
भगवान श्रीचित्रगुप्तजी की आंखे आशान्वित होकर हमें देख रही हैं। आइये भगवान आदिदेव श्रीचित्रगुप्तजी इस हार्दिक इच्छा को पूर्ण करने में अपना योगदान देने के लिये प्रथम पग बढ़ाएं।
।। माता सुनंदा-इरावती एवं द्वादश कायस्थ सहित श्रीचित्रगुप्ताये नम:।।